Tuesday, March 21, 2017

जब से मिले हो तुम


जीवन  बदला ,दुनिया बदली,
मन को अनोखा,ज्ञान मिला।
मिलकर तुमसे मुझको मुझमें
 एक नया इंसान मिला।

रोके भी नहीं रुकती थी जो,
आज चलाए चलती हूँ।
जो तुम चाहते वही हूँ करती
जैसे कोई कठपुतली हूँ

माथे की तुम्हारी एक शिकन,
मन ऐसा झकझोरे क्यों...
होंठों की तुम्हारी एक हँसी
मानूँ जीवन की बडी खुशी

गलती भी तुम्हारी सिर्फ़ शरारत,
दुख अपना गर तुम्हें मुसीबत ।
दुनिया अपनी उजड सी जाती,
आँखों में दिखे गर थोड़ी नफरत ।

बेवशी सी कैसी छायी मुझमें
क्यों हर सुख-दुख देखूँ तुममें.....

कब चाहा ऐसे बन जाऊँँ,
जजबाती फिर कहलाऊँ।
प्रेम-दीवानी सी बनकर......
फिर विरह-व्यथा में पछताऊँ ।

Wednesday, March 8, 2017

दो दिन की हमदर्दी में, जीवन किसका निभ पाया....


जाने इनके जीवन में ,
ये कैसा मोड आया,
खुशियाँँ कोसों दूर गयी
दुख का सागर गहराया...
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया.....

आयी है बसंत मौसम में,
हरियाली है हर मन में,
पतझड़ है तो बस इनके,
इस सूने से जीवन में.......
इस सूने जीवन में तो क्या,
खुशियाँ आना मुमकिन है ?
आँसू अविरल बहते इनके ,
मन मेरा ऐसे घबराया......

छिन गया बचपन बच्चों का,
उठ गया सर से जब साया,
हो गये अनाथ जो इक पल में
नहीं रहा पिता का इन्हे सहारा.....
मुश्किल जीवन बीहड राहें,
उस पर मासूम अकेले से,
कैसे आगे बढ पायेंगे,
मेरा मन सोचे घबराया.....

बूढे माँ-बाप आँखें फैलाकर,
जिसकी राह निहारा करते थे।
उसे "शहीद "कह विदा कर रहे,
स्वयं विदा जिससे लेने वाले थे...
इन बूढी आँखों के बहते जो,
आँसू कौन पोंछने आयेगा.......
"गर्व करे शहीदों पर"पूरा देश।
घरवालों को कौन संभालेगा.....
दो दिन की हमदर्दी में,
जीवन किसका निभ पाया....
कैसे खुद को संभालेंगे
मेरा मन सोचे घबराया...

जाने इनके जीवन में,
एक ऐसा ही मोड़ आया
खुशियाँ कोसों दूर गयी...
दुख का सागर गहराया ।।

Saturday, February 25, 2017

"पुष्प और भ्रमर"





तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।

हमेशा रहोगे तुम साथ मेरे...।.
बसंत अब हमेशा खिला ही रहेगा
तुम मुस्कुराये तो मैंं खिलखिलाई......
ये सूरज सदा यूँ चमकता रहेगा ।

न आयेगा पतझड़ न आयेगी आँधी.......
मेरा फूलमन यूँ ही खिलता रहेगा
तुम सुनाते रह़ोगे तराने हमेशा....
और मुझमें मकरन्द बढता रहेगा

तुम्हें और जाने की फुरसत न होगी.....
मेरा प्यार बस यूँ ही फलता रहेगा ।।

           "मगर अफसोस" !!!

तुम तो भ्रमर थे मै इक फूल ठहरी......
वफा कर न पाये ? / था जाना जरूरी ?
मैंं पलकें बिछा कर तेरी राह देखूँ.....                      
ये इन्तजार अब यूँ ही चलता रहेगा ।

मौसम में जब भी समाँ लौट आये.....
मेरा दिल हमेशा तडपता रहेगा .........


*कि ये "शुभ मिलन" अब पुनः कब बनेगा*
   

                                                      ...सुधा देवरानी*







                                                   

             




Sunday, February 12, 2017

हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है ;



जंग लगे/दीमक खाये खोखले से थे वे,
कलई / पालिस कर चमका दिये गये
नये /मजबूत से दिखने लगे एकदम...
ऐसे सामानों को बाजारों में बिकते देखा है।
खोखले थे सो टूटना ही था,
दोष लाने वालों पर मढ दिये गये...
शुभ और अशुभ भी हो गयी घडियाँ....
मनहूसियत को बहुओं के सर मढते देखा है।
हाँ !मैने कुछ रिश्तों को टूटते-बिखरते देखा है।

झगड़ते थे बचपन मे भी,
खिलौने भी छीन लेते थे एक-दूसरे के....
क्योंकि खिलौने लेने तो पास आयेगा दूसरा,
हाँ! "पास आयेगा" ये भाव था प्यार/अपनेपन का....
उन्ही प्यार के भावों में नफरत को भरते देखा है।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है।

वो बचपन था अब बडे हुए,
तब प्यार था अब नफरत है.....
छीनने के लिए खिलौने थे,
औऱ अब पैतृक सम्पत्ति.....
तब सुलह कराने के लिए माँ-बाप थे,
अब वकील औऱ न्यायाधीश....
भरी सभा में सच को मजबूरन गूँगा होते देखा है ;
या यूँ कह दें-"झूठ के आगे सच को झुकते देखा है"।
हाँ ! मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

हो गयी जीत मिल गये हिस्से,
खत्म हुए अब कोर्ट के किस्से...
जश्न मनाते सारे चमचे,
नाचते-गाते नये-नये रिश्ते...
अंधियारे -सूने कोने में छुप उसको सुबकते देखा है ;
या यूँ कह दे-"प्रेम के आगे दंभ को झुकते देखा है",
हाँ!मैने कुछ रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।

पर क्या फायदा ? पहल करेगा कौन,
जब बडा बडा ही बनकर बैठा,
छोटा भी छुटपन में ऐंठा.....
पडौसी रिश्ते तमाशबीन हुए,
माँ-बाप परलोक जो गये.......
कौन सुलह करवाए इनकी,
झूठी शान खोखला अभिमान...
अक्ल पर भी तो जाने कब से बडा सा पत्थर फेरा है ;
ऐसे में भी कभी किसी ने रिश्तों को निभते देखा है ?
हाँ !मैने ऐसे ही रिश्तों को टूटते -बिखरते देखा है ।।
                                                         
                                           ....सुधा देवरानी

Wednesday, January 25, 2017

बेरोजगारी : "एक अभिशाप"


   नवयुवा अपने देश के,
    पढे-लिखे ,डिग्रीधारी
    सक्षम,समृद्ध, सुशिक्षित
     झेल रहे बेरोजगारी।
                               कर्ज ले,प्राप्त की उच्च शिक्षा,
                                अब सेठजी के ताने सुनते।
                               परेशान ये मानसिक तनाव से,
                                आत्महत्या के रास्ते ढूँढते।
      माँ,बहनों के दु:ख जो सह न सके,
      वे अभागे गरीबी मिटाने के वास्ते,
      परचून की दुकान पर मिर्ची तोल रहे।
      तो कुछ सैल्समैन बन गली-गली डोल  रहे।
                                        कुछ प्रशिक्षित नव-युवा,
                                        आन्दोलन कर रहे धरने पर बैठे,
                                        नारेबाजी के तुक्के भिडाते,
                                          मंत्री जी की राह देखते,
                                           नौकरी की गुहार लगाते।
      तो कुछ विदेशी कम्पनियों की सदस्यता
       में धन-जन जुटाने के जुगाड़ लगाते
          "हमारे सुशिक्षित नवयुवक,"
         " निठल्ले ,निकम्मे कहलाते"।
 बेरोजगारी इनके लिये अभिशाप नहीं तो और क्या है।
    अपने देश का ये दुर्भाग्य नहीं तो और क्या है !!!
                                                           (सुधा देवरानी)
                                   

Monday, January 9, 2017

नारी-"अबला नहीं"



आभूषण रूपी बेडियाँ पहनकर...
अपमान, प्रताड़ना का दण्ड,
सहना नियति मान लिया...
अबला बनकर निर्भर रहकर,
जीना है यह जान लिया....
सदियों से हो रहा ये शोषण,
अब विनाश तक पहुँच गया ।
"नर-पिशाच" का फैला तोरण,
पूरे समाज तक पहुँच गया ।।


अब वक्त आ गया वर्चस्व करने का......
अन्धविश्वाश ,रूढिवादिता ,कुप्रथाओं,
से हो रहे विनाश को हरने का...
हाँ ! वक्त आ गया अब पुन: 
शक्ति रूप धारण करने का......


त्याग दो ये "बेडियाँ" तुम,
"लौहतन" अपना बना दो !
थरथराये अब ये दानव...
शक्तियां अपनी जगा दो !!!
लो हिसाब हर शोषण का...
उखाड़ फेंको अब ये तोरण !
याद आ जाए सभी को..
रानी लक्ष्मीबाई का युद्ध-भीषण ।


उठो नारी ! "आत्मजाग्रति" लाकर,
"आत्मशक्तियाँ" तुम बढाओ !
"आत्मरक्षक" स्वयं बनकर ....
"निर्भय" निज जीवन बनाओ !!
शक्ति अपनी तुम जगाओ !!!
         .                   - सुधा देवरानी



Saturday, December 31, 2016

"नववर्ष मंगलमय हो"


                  नववर्ष के शुभ आगमन पर,
                  शुभकामनाएं हैं हमारी।
                  मंगलमय जीवन हो सबका,
                  प्रेममय दुनिया हो सारी।
                  हवा सुखमय मधुर महके,
                  हरितिमा अपनी धरा हो।
                  खुशनुमा  आकाश अपना,
                  स्वर्ग सा संसार हो।
                  नववर्ष ऐसा मंगलमय हो।
        
                 आशाओं के अबुझ दीपक,
                 अब जले हर इक सदन में।
                 उम्मीदों की किरण लेकर, 
                 रवि आना तुम प्रत्येक मन में।
                 ज्योतिर्मय हर -इक भुवन हो
                 नववर्ष ऐसा मंगलमय हो।
     
                 मनोबल यों उठे ऊँचा,
                अडिग विश्वास हो मन में।
                अंत:करण प्रकाशित हो सबका,
                ऊर्ध्वमुखी जीवन हो।
                "सुप्त देवत्व" जगे मनुज का,
                 देवशक्ति प्रबल हो,
                 नववर्ष ऐसा मंगलमय हो।
  
                अनीति मुँह छिपा जाए,
                प्रबलता नीति में आये।
                श्रेष्ठ चिन्तन आचरण से,
                विश्व की गरिमा बढाएं,
                गरिमामय जग हो
                नववर्ष मंगलमय हो।