तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
वर्तमान समय में बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा और जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय बन चुके हैं। मानव द्वारा प्रकृति के निरंतर दोहन और वनों की कटाई का दुष्परिणाम आज भीषण गर्मी, सूखा और पर्यावरण असंतुलन के रूप में सामने आ रहा है। प्रस्तुत कुण्डलियों में इसी गंभीर समस्या का चित्रण करते हुए वृक्षारोपण और पर्यावरण संरक्षण का संदेश दिया गया है।
भीषण गर्मी से हुआ, जन-जीवन बेहाल ।
लू की लपटें चल रही, तपे दुपहरी ज्वाल ।
तपे दुपहरी ज्वाल, सभी बारिश को तरसें ।
बीत रहा आषाढ़, बूँद ना बादल बरसे ।
कहे सुधा सुन मीत, बने सब मानव धर्मी ।
आओ रोपें वृक्ष , मिटेगी भीषण गर्मी ।।
【2】
रातें काटे ना कटे, अलसायी है भोर ।
आग उगलती दोपहर, त्राहि-त्राहि चहुँ ओर ।
त्राहि-त्राहि चहुँ ओर, वक्त ये कैसा आया ।
प्रकृति से खिलवाड़, नतीजा ऐसा पाया ।
कहे सुधा कर जोरि, वनों को अब ना काटें ।
पर्यावरण सुधार , सुखद बीते दिन-रातें ।।
प्रकृति और मानव का संबंध अत्यंत गहरा है। यदि हम पर्यावरण संरक्षण के प्रति सजग नहीं होंगे तो बढ़ती गर्मी और जलवायु संकट भविष्य को और अधिक कठिन बना देंगे। वृक्षारोपण, जल संरक्षण और वनों की रक्षा जैसे छोटे-छोटे प्रयास भी धरती को सुरक्षित और संतुलित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आइए, हम सभी मिलकर हरित पर्यावरण के निर्माण का संकल्प लें।
✨धन्यवाद🙏
गर्मी पर मेरी एक और रचना पढ़िए निम्न लिंक पर-
वाह! सुधा जी ,बहुत खूबसूरत सृजन।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद शुभा जी !
हटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद भारती जी !
हटाएंसखी दुनिया भर भर पी रही अपना शहर भी तपता और प्यासा है! प्रभावी रचना के लिए बधाई प्रिय सुधा
जवाब देंहटाएंसही कहा आपने दुनिया भर भर पी रही...पता नहीं यहाँ क्यों सूखा पड़ा हैं ।
हटाएंतहेदिल से धन्यवाद आपका ।