मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत
क्या आपको भी अपने गाँव की मिट्टी की खुशबू और बचपन की यादें बार-बार अपनी ओर खींचती हैं?
प्रस्तुत है एक भावपूर्ण गढ़वाली गीत “माटी मेरे गाँव की”, जिसमें पहाड़ की बदलती तस्वीर, पुरानी यादें और गाँव का स्नेहिल अपनापन झलकता है। यह गीत उन प्रवासियों को रैबार (संदेश) देकर पुकारता है, जो रोज़गार या परिस्थितियों के कारण गाँव छोड़कर दूर बस गए और फिर लौट नहीं पाए। साथ ही, यह गाँव की उन बेटियों को भी स्नेह से याद करता है, जो ससुराल और शहर की व्यस्तताओं में अपने मायके—अपने गाँव—तक अब कम ही पहुँच पाती हैं।
छ्वाया फूटे सौण - भादों , धार नदियों संग आई
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी
बोली मुझसे खुद लगीं बा
हो सके तो गाँव आ जा
बीसीयों बीते मिले आ
अब तो ये सूरत दिखा जा
मटण्या पाणी, सौंधी खुशबू
समलौण्या दुलार लायी
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी
वो पहाड़ी धार वाली
बोली द्या अब ना गिरेगी
बाट चौड़े पक्के वाले
माट में अब ना सनेगी
गाड़ी मोटर पों-पों करती
अब तो हर इक ख्वाल आयी
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी
म्याल ना लिपने पड़ेंगे
चमचमाती फर्श बोली
कूड़ी में लेंटर पड़े अब
हुई चकमक रौली-खौली
कम हुए हैं गोर-बाछी
कार जब से ढ्यार आयी
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी
ना पुरानी बात है अब
सार्यूं मा कुर्री की झाड़ी
पुँगड़ी-पटली बाँझ हैं सब
सूनी-सूनी हैं तिबारी
पर घुघूती जब बासूति
तब पुरानी याद आयी
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी ।
हाँ पुराने दिन यहाँ
खेतों में फसलें हरहराती
कोदो लौ ती बेटी ब्वारी
झंगोरे की बात आती
स्यार में सट्टी थे पकते
उरख्यली चूड़ा कुटायी
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी
दे दनादन फसल पकती
बाद सब त्यौहार आते
प्रथम अन्न बग्वाल के दिन
सब गौमाता को खिलाते
हर जरूरतमंद को फिर
अन्न भर देते बधाई
माटी मेरे गाँव की मुझसे मिली रैबार लायी
कविता का भावार्थ
यह गीत एक ऐसे व्यक्ति की भावनाओं को दर्शाता है जो अपने गाँव से दूर है । गाँव की माटी उसे पुकार रही है—पुराने दिन, खेत-खलिहान, त्योहार और अपनापन सब उसे वापस लौटने का निमंत्रण दे रहे हैं ।
समय के साथ गाँव बदल गया है—पक्की सड़कें, गाड़ियाँ और आधुनिक घर आ गए हैं, लेकिन बचपन की यादें और मिट्टी की खुशबू आज भी वैसी ही हैं ।
छ्वाया = पहाड़ो में बरसात की लगातार बारिश के चलते धरती से पानी की धाराएं निकलती हैं , इन्हें छ्वाया फूटना कहते है।
रैबार = संदेश
बा = बच्चों को लाड-प्यार से संबोधित करते हैं
समलौण्या = अतीत की मीठी यादें
द्या = छोटे भाई- बहनों के लिए प्यार भरा संबोधन
ख्वाल = गली - मोहल्ला
म्याल = गोबर मिट्टी से लिपा-पुता फर्श
कूड़ी = पठाल (चौडे-चपटे विशेष पत्थर) से बनी छत
रौली-खौली = गाड़ - गधेरे (दो छोटी पहाडियों के बीच की कम गहरी घाटी )
गोर-बाछी = गाय - बछिया
ढ्यार = घर
सार्यूं = खेती वाली जमीन
कुर्री = बंजर / बंध्या जमीन में उगने वाली झाड़ी
पुंगड़ी -पटली = खेत खलिहान
तिबारी = घर का ऊपरी कक्ष जहाँ बड़े बुजुर्ग और मेहमान बैठते हैं
घुघूती बासूती = पहाड़ का विशेष पक्षी और उसका मनमोहक स्वर
कोदो - झंगोरा = पहाड़ में उगने वाले मोटे अनाज (मिलेट्स)
सट्टी = धान की फसल
स्यार = धान के खेत
उरख्यली = बड़ा सा इमामदस्ता जिसमें धान कूटे जाते हैं
बग्वाल = गोवर्धन पूजा
निष्कर्ष
“माटी मेरे गाँव की” केवल एक गीत नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति की भावना है जो अपने गाँव से दूर रहकर भी उसकी मिट्टी से जुड़ा हुआ है ।
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✨धन्यवाद 🙏
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तहेदिल से धन्यवाद प्रिय श्वेता सराहना संपन्न प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन कर 'पाँच लिंकों के आनंद' मंच पर इसे स्थान देने के लिए ।
जवाब देंहटाएंशब्दों के अर्थ लिख दिए हैं सुझाव हेतु सस्नेह आभार प्रिय !
वाह
जवाब देंहटाएंगढ़वाली भाषा की मिठास से ओतप्रोत सुंदर दिल को छू लेने वाली रचना
जवाब देंहटाएंबहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति सुधा जी ...
जवाब देंहटाएंगांव की माटी की सुगंध बिखेरती बहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबधाई
आहा आंचलिक चब्दों के साथ आँचल की खुशबू सिमिट आती है ...
जवाब देंहटाएंगीत पढ़कर आपके गांव की माटी की सोंधी-सोंधी गंध मन में रच-बस गई सुधा जी
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