अब जागी है तो भोर तेरी | नारी के आत्मसम्मान पर हिंदी कविता

 विवरण (परिचय)

नारी केवल परिवार की धुरी नहीं, बल्कि समाज की सबसे मजबूत नींव है। फिर भी कई बार उसके त्याग, भावनाओं और सामर्थ्य को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है। यह कविता एक स्त्री की उसी अनकही पीड़ा, आत्मसम्मान और जागरण की कहानी कहती है।


               

"उगते सूरज की रोशनी में आत्मविश्वास के साथ खड़ी भारतीय महिला, जो नारी के आत्मसम्मान और जागरण का प्रतीक है।"

              


पोषी जो संतति तूने,  उसमें भी क्यों जज्बात नहीं ।

अंतरिक्ष तक परचम तेरा, पर घर में औकात नहीं।


मान सभी को इतना देती ,तुझको माने ना कोई ।

पूरे घर की धुरी है तू, फिर भी कुछ अपने हाथ नहीं ।


एक भिखारी दर पे आ, पल में मजबूरी भाँप गया ।

खाली लौट गया बोला, " माता कोई बात नहीं"।


पंख दिये जिनको तूने, उड़ने की नसीहत देते वे ।

ममता की घनेरी छाँव दिखी, क्षमता तेरी ज्ञात नहीं ।


पर तू अपनी कोशिश से, अपना लोहा मनवायेगी ।

अब जागी है तो भोर तेरी, दिन बाकी है अब रात नहीं।


जनमों की उलझन है ये , धर धीरज ही सुलझाना तू ।

अपना मूल्यांकन हक तेरा, नैतिकता पर आघात नहीं ।


कविता का भाव

यह कविता हर उस स्त्री को समर्पित है जिसने अपने परिवार, बच्चों और समाज के लिए निस्वार्थ भाव से जीवन समर्पित किया, लेकिन बदले में अक्सर उपेक्षा का सामना किया। यह केवल पीड़ा की बात नहीं करती, बल्कि आत्मविश्वास, जागृति और अपने मूल्य को पहचानने का संदेश भी देती है।


निष्कर्ष

हर स्त्री सम्मान, समान अवसर और अपनी पहचान की अधिकारिणी है। जब वह स्वयं अपने मूल्य को पहचान लेती है, तभी उसके जीवन की वास्तविक भोर होती है। यह कविता उसी आत्मजागरण और आत्मसम्मान का संदेश देती है।

 


✨धन्यवाद 🙏

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📚 अनुशंसित पुस्तक

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टिप्पणियाँ

  1. दिगंबर नासवा1 जुलाई 2024 को 7:37 pm बजे

    बहुत ही गहरी और भावपूर्ण …

    जवाब देंहटाएं
  2. प्रेरणादायक पंक्तियाँ

    जवाब देंहटाएं
  3. द‍िल चीर रही हैं आपकी ल‍िखी ये पंक्त‍ियां क‍ि-
    ''पर तू अपनी कोशिश से, अपना लोहा मनवायेगी ।अब जागी है तो भोर तेरी, दिन बाकी है अब रात नहीं।''
    और एक ज‍िज‍िव‍िषा में समेट हौसलों को नई उड़ान दे रही हैं सुधा जी....वाह क्या खूब ल‍िखा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. तहेदिल से धन्यवाद जवं आभार आपका अलकनंदा जी !

      हटाएं
  4. जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं, सुधा दी।

    जवाब देंहटाएं
  5. पोषी जो संतति तूने, उसमें भी क्यों जज्बात नहीं ।
    अंतरिक्ष तक परचम तेरा, पर घर में औकात नहीं।
    हर पंक्ति बहुत सार्थक और विचार करने को प्रेरित करती हुई।

    जवाब देंहटाएं
  6. हृदयतल से धन्यवाद आपका प्रिय श्वेता !

    जवाब देंहटाएं
  7. रेखा श्रीवास्तव4 जुलाई 2024 को 2:22 pm बजे

    नारी के जीवन की दायित्वों और बंधनों को समर्पण में बाँध कर बहुत अच्छी रचना रची। हार्दिक बधाई !

    जवाब देंहटाएं
  8. प्रिय सुधा, सबका संबल बनने की धुन में अपने व्यक्तित्व को ही गँवा देती हैं नारी! बाहर जाती है तो उसकी नैतिकता और मूल्य दाव पर लग जाते हैं! सच में अपना मूल्यांकन और स्वाभिमान पर अधिकार के साथ नैतिकता के साथ कोई समझौता ना हों ये बेहद जरूरी है! एक मर्मांतक रचना जो गहरे तक उतर गई

    जवाब देंहटाएं

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