पेड़-- पर्यावरण संतुलन की इकाई
हम अचल, मूक ही सही मगर
तेरा जीवन निर्भर है हम पर
तू भूल गया अपनी ही जरूरत
हम बिन तेरा जीवन नश्वर
तेरी दुनिया का अस्तित्व हैं हम
हम पर ही हाथ उठाता है,
आदम तू भूला जाता है
हम संग खुद को ही मिटाता है
अपना आवास बनाने को
तू पेड़ काटता जाता है
परिन्दोंं के नीड़ों को तोड़
तू अपनी खुशी मनाता है
बस बहुत हुआ ताण्डव तेरा
अबकी तो अपनी बारी है
हम पेड़ भले ही अचल,अबुलन
हम बिन ये सृष्टि अधूरी है
वन-उपवन मिटाकर,बंगले सजा
सुख शान्ति कहाँ से लायेगा ?
साँसों में तेरे प्राण निहित तो
प्राणवायु कहाँ से पायेगा ?
चींटी से लेकर हाथी तक
आश्रित हैं हम पर ही सब
तू पुनः विचार ले आदम हम बिन
पर्यावरण संतुलित नहीं रह पायेगा ।

सुंदर सकारात्मक सृजन
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना मंगलवार 16 मई 2022 को
जवाब देंहटाएंपांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.संगीता जी !
हटाएंमेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
दिनांक ---- 17 मई
जवाब देंहटाएंजी, 🙏🙏🙏🙏
हटाएंबहुत ही सुंदर सराहनीय सृजन। नष्ट होते जंगल, पेड़ों का दोहन, मूक बैठा मानव... गहन चिंतन लिए बढ़िया रचना।
जवाब देंहटाएंसादर
बहुत सुन्दर सकारात्मक संदेश देती रचना !
जवाब देंहटाएंपर्यावरण संरक्षण के प्रति मनुष्यों की उदासीनता चिंतनीय है।आवश्यकता है आज प्रकृति के प्रति स्वंय के कर्तव्यों का बोध करने की अन्य लोगों को.भी प्रेरित करने की।
जवाब देंहटाएंसार्थक सृजन.सुधा जी।
सस्नेह।
इतनी विभिषिका झेलने के बाद भी हम असुरी नींद से नहीं जागे तो क्या कहा जाए। न जाने हम कब सुधरेंगे। प्रभावी सृजन।
जवाब देंहटाएंसुधा जी,
जवाब देंहटाएंहम जो प्रतिक्रिया लिखे क्यों नहीं दीख रहा प्लीज आप स्पेम में चेक करिये न क्योंकि मेरे ब्लॉग पर.भी बहुत सारी प्रतिक्रिया स्पेम में जा रही जिसे not spam करके हम पब्लिश किए।
शायद कुछ प्रतिक्रिया स्पेम में हों।
जी, श्वेता जी ! स्पेम में थी आपकी प्रतिक्रिया ..अन्य पोस्ट पर भी यही था । बहुत बहुत धन्यवाद बताने के लिए अब सभी को पब्लिश कर दिया...
हटाएंदिल से आभार आपका।
इन निरीह पेड़ों की व्यथा कौन जान सका है सिवाय कवि मन के।भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय सुधा जी।
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