प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

बहुत ही सुन्दर सामयिक छंद हैं ... राखी की बहुत बहुत बधाई ..
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद नासवा जी ! आपको भी राखी की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं ।
हटाएंआपकी लिखी रचना "पांच लिंकों के आनन्द में सोमवार 11 अगस्त 2025 को लिंक की जाएगी .... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ... धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद सखी ! "मेरी रचना पाँच लिंकों के आनंद" मंच के लिए चयन करने हेतु ।
हटाएंबहुत ही सुंदर छंद बंध
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद प्रिया जी !
जवाब देंहटाएंबेहतरीन छंद
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद हरीश जी !
हटाएंवाह
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार एवं धन्यवाद जोशी जी !
हटाएंबेहतरीन
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार मनोज जी !
हटाएंबहुत ही सुन्दर रचना, सुधा दी।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार ज्योति जी !
हटाएंबहुत सुन्दर भावपूर्ण भावाभिव्यक्ति । अति सुन्दर रोला छन्द सृजन ।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार मीना जी !
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