तीन कुण्डलिया :- भारत महान, हार और विचलित
परीक्षा का समय आते ही घरों में पढ़ाई, अंक और भविष्य को लेकर चर्चाएँ बढ़ जाती हैं। ऐसे में बच्चों पर केवल पढ़ाई का ही नहीं, बल्कि "लोग क्या कहेंगे" जैसी चिंताओं का भी दबाव पड़ने लगता है। प्रस्तुत लघुकथा एक मासूम बच्ची के सहज उत्तर के माध्यम से हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम अनजाने में बच्चों के कंधों पर आवश्यकता से अधिक बोझ तो नहीं डाल रहे।
मोना!... ओ मोना!" आवाज़ देते हुए माँ उसके स्टडी रूम में पहुँची।
कमरे का दृश्य देखकर उनका माथा ठनक गया। सामने खुली किताब रखी थी और उसके ऊपर पूरा डॉल हाउस सजा हुआ था। मोना अपनी गुड़िया को सजाने में इतनी तल्लीन थी कि उसे न माँ की आवाज़ सुनाई दी, न उनके आने की आहट।
कल उसकी परीक्षा थी और आज भी वह खेल में मग्न थी।
गुस्से में माँ ने उसकी बाँह पकड़कर हल्का-सा झिंझोड़ा। मोना एकदम चौंक गई।
सामने माँ को देखकर उसने आँखें बंद कर गहरी साँस ली और बोली—
"ओह! मम्मी, आप हो! मुझे लगा पापा आ गए।"
"अच्छा"अच्छा! पापा का डर और मम्मी की कोई परवाह नहीं?" माँ की आवाज़ गुस्से से भर उठी।
मोना मुस्कराई और बोली—
"श्श्श... मम्मी! आपके अंदर पापा की आत्मा घुस गई क्या?" !
"
"देख मोना! मुझे और गुस्सा मत दिला। बंद कर ये खेल-खिलौने और चुपचाप पढ़ने बैठ जा। कल तेरी परीक्षा है। कम से कम आज तो मन लगाकर पढ़ ले।"
"श्श्श...क्या मम्मी ! आपके अंदर पापा की आत्मा घुस गई क्या" ?
"देख मोना ! मुझे गुस्सा मत दिला ! बंद कर ये खेल खिलौने ! और चुपचाप पढ़ने बैठ जा । कल तेरी परीक्षा है, कम से कम आज तो मन लगाकर पढ़ ले ।"
मोना ने गुड़िया की ओर देखते हुए कहा— वही तो कर रही हूँ मम्मी ! मन बार -बार इसके बारे में सोच रहा था तो सोचा पहले इसे ही तैयार कर लूँ , फिर पूरा मन पढ़ाई में लगाउँगी ।"
"बेटा ! तुझे समझ क्यों नहीं आता ? क्यों नहीं सोचती कि तेरे कम मार्क्स आएंगे तो सब क्या सोचेंगे तेरे बारे में ?"
"ओह्हो मम्मी ! अब ये भी मैं ही सोचूँ ? सब क्या सोचेंगे' यह सोचने का ठेका मैंने थोड़ी लिया है। मेरा काम हो गया, अब मैं पढ़ने बैठती हूँ।"
यह कहकर उसने अपना डॉल हाउस समेटा और किताब खोलकर पढ़ने बैठ गई।
लेकिन माँ वहीं खड़ी रह गईं।
उनके मन में मोना की बात गूँज रही थी—
"सब क्या सोचेंगे, यह भी मैं ही क्यों सोचूँ?"
अचानक उन्हें एहसास हुआ कि सचमुच हम अपने बच्चों पर पढ़ाई का दबाव तो डालते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ "लोग क्या कहेंगे" का अनावश्यक बोझ भी लाद देते हैं।
बात समझ में आई तो उनके अधरों पर मुस्कान खिल गई।
शायद मोना ने आज एक छोटी-सी बात में जीवन का बड़ा पाठ पढ़ा दिया था।
पढ़िए ऐसे ही माँ-बेटी के वार्तालाप पर आधारित एक और लघु कथा -
सचमुच बच्चे मासूम और मनमौजी होते हैं वो कहाँ सोच पाते है उनके द्वारा की गयी गलतियों पर कौन क्या कहेगा उनको तो बस में अपने मम्मी पापा से मतलब।
जवाब देंहटाएंसस्नेह प्रणाम दी।
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १ अक्टूबर २०२४ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सस्नेह आभार प्रिय श्वेता ! आपके इस सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए।
हटाएंसस्नेह आभार प्रिय श्वेता ! आपके इस सहयोग एवं प्रोत्साहन के लिए।
जवाब देंहटाएंसुधा जी, इस प्यारी सी लघु कथा के लिए धन्यवाद। अभिनंदन।
जवाब देंहटाएं"दूसरे क्या सोचेंगे, ये भी मैं ही सोचूँ ?"
इस मासूम और सहज जवाब में कितनी सच्चाई है ! वास्तव में बच्चों की जुबान पर सरस्वती बैठती हैं।
जी, नुपुरं जी ! तहेदिल से धन्यवाद आपका
हटाएंसार्थक संदेश देती लघुकथा
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर, लोग क्या सोचेंगे
जवाब देंहटाएंलाख टके की बात !
जवाब देंहटाएंमाँ-बाप के रूप में हम सबने - 'लोग क्या कहेंगे' की दुहाई दे कर अपने-अपने बच्चों पर कई बार पढ़ाई, फ़ैशन, दोस्ती, शादी वगैरा को ले कर अनावश्यक दबाव डाले हैं.
एक अध्यापक के रूप में मेरा अनुभव है कि बच्चों पर अगर पढ़ने का दबाव न डाला जाए तो ज़्यादातर बच्चे मन लगा कर पढ़ते हैं.
जी, सर ! सही कहा आपने..सारगर्भित प्रतिक्रिया से सृजन को सार्थकता प्रदान करने हेतु तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार आपका । 🙏🙏
हटाएंसुन्दर सी लघुकथा के माध्यम से बहुत सुन्दर संदेश सुधा जी ! अति सुन्दर सृजन ।
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद एवं आभार मीना जी !
हटाएंअद्भुत लेखन बहुत ही सुंदर लघु कथा
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