प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

सभी हायकु बहुत बढ़िया है,सुधा दी।
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद ज्योति जी!उत्साहवर्धन हेतु।
हटाएंआपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 29 अगस्त 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंजी!यशोदा जी तहेदिल से धन्यवाद आपका।
हटाएंसादर आभार।
लाजवाब हाइकु । विविधताओं से परिपूर्ण । अति सुन्दर ।
जवाब देंहटाएंउत्साहवर्धन हेतु अत्यंत आभार एवं धन्यवाद मीना जी!
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंसहृदय धन्यवाद आ. जोशी जी!
हटाएंसटीक हाइकू...वाह सुधा जी
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद अलकनंदा जी!
हटाएंसादर आभार।
सुंदर हाइकु.....
जवाब देंहटाएंअत्यंत आभार एवं धन्यवाद विकास जी!
हटाएंबाखूबी हाथ आजमाया है इस हाइकू की विधा में भी आपने ... स्पष्ट, तीखे, सामयिक और लाजवाब हैं सभी ...
जवाब देंहटाएंऐसे ही लिखती रहे ... मेरी बहुत बहुत शुभकामनायें ...
आपकी अनमोल प्रतिक्रिया पाकर सृजन सार्थक हुआ आ.नासवा जी!
हटाएंहार्दिक धन्यवाद एवन आभार आपका।
लॉक डाउन का सामयिक चित्रण।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद सर!
हटाएंसादर आभार।