प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

बरसात में गरीबो की झोपड़ी में टपकते पानी से उन्हें कितनी तकलीफे होती है ये वो ही समझ सकते है। बहुत सुंदर रचना,सुधा दी।
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद ज्योति जी!
हटाएंसस्नेह आभार।
बहुत सुंदर भाव-प्रवण रचना।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद आ.विश्वमोहन जी!
हटाएंसादर आभार।
जब झोपड़ी की छत न चुए तो पूनम है
जवाब देंहटाएंसुंदर सृजन
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार आ.संगीता जी!
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