प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

सत्व इसका सृष्टि को था बहुत भाया,
जवाब देंहटाएंहो प्रफुल्लित 'पुष्प का राजा' बनाया ।
बहुत खूब, फुलों के राजा का इतना प्यारा वर्णन,मन मोह लिया आपने सुधा जी 🙏
तहेदिल से धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी !
हटाएंआपकी अनमोल प्रतिक्रिया से सृजन सार्थक हुआ ।
सर्द ठिठुरन, ओस, कोहरा सब भुलाकर
जवाब देंहटाएंमुस्कराया जब वो पाटल खिलखिलाकर ।
सुंदर
सादर
फूलों के राजा का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है सुधा दी आपने।
जवाब देंहटाएंवाह !
जवाब देंहटाएंहमारी ठण्ड में कंपकंपी छूट रही है लेकिन फूलों का राजा कांपने के बजाय मुस्कुरा रहा है, खिलखिला रहा है.
सुंदर सृजन ,
जवाब देंहटाएंप्रकृति हर मौसम में स्वयं को ढाल लेती है ।
हम मनुष्य ही हर तरह के मौसम को अपने अनुरूप बनाना चाहते हैं ।
वैसे बहुत सर्दी है भई ।
सर्द मौसम. पुष्पों, मकरंदों के दिन ।
जवाब देंहटाएंसवार इतनी सुंदर मोहक कविता मन मोह गई ।
लाजवाब शब्द विन्यास । बधाई सखी ।
*सवार/उस पर
जवाब देंहटाएंशरद के आगमन को बखूबी शब्दों में उढ़ेला है आपने .. हर छंद लाजवाब है .. ऋतु विशेष की और इशारा करता हुआ …
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