प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

 

Spring seasion

बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज 


फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी

श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी

भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।


आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती

ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती

लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  ।


सौंधी महक माटी की मन को भा रही है

अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है

 टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़

प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज ।



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● बसंत की पदचाप


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