धन्य-धन्य कोदंड | श्रीराम पर कुण्डलिया छंद
परिचय
पुरुषोत्तम श्रीराम का, धनुष हुआ कोदंड ।
शर निकले जब चाप से, करते रोर प्रचंड ।।
करते रोर प्रचंड, शत्रुदल थर थर काँपे।
सुनकर के टंकार, विकल हो बल को भाँपे ।।
कहे सुधा कर जोरि, कर्म निष्काम नरोत्तम ।
सर्वशक्तिमय राम, मर्यादा पुरुषोत्तम ।।
अति गर्वित कोदंड है, सज काँधे श्रीराम ।
हुआ अलौकिक बाँस भी, करता शत्रु तमाम ।।
करता शत्रु तमाम, साथ प्रभुजी का पाया ।
कर भीषण टंकार, सिंधु का दर्प घटाया ।।
धन्य धन्य कोदंड, धारते जिसे अवधपति ।
धन्य दण्डकारण्य, सदा से हो गर्वित अति ।
निष्कर्ष
कोदंड केवल श्रीराम के शौर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि उनके धर्म, मर्यादा और कर्तव्यनिष्ठा की स्मृति भी कराता है। इन कुण्डलियों में उसी भाव को अपने शब्दों में अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है।
✨धन्यवाद 🙏
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बहुत सुंदर भावपूर्ण, लाज़वाब रचनात्मक प्रयोग कुंडलियां दी।
जवाब देंहटाएंशुभ दशहरा
सस्नेह
सादर।
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जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३ अक्टूबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंवाह !! मनमोहक सृजन ।अति सुन्दर कुण्डलियाँ सुधा जी !
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर वर्णन ... धनुष को बाखूबी लिखा आपने ...
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