प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

करते रहो प्रयास बहुत सुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर
जवाब देंहटाएंसुंदर,प्रेरक, सकारात्मक संदेश देती ऊर्जावान अभिव्यक्ति दी।
जवाब देंहटाएंसस्नेह
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार १४ अक्टूबर २०२५ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
सुंदर बोध देते दोहे
जवाब देंहटाएंसकारात्मक ऊर्जा का संचार करती बहुत सुन्दर दोहावली ।
जवाब देंहटाएंसार्थक, सामयिक बहुत सुन्दर होदे ...
जवाब देंहटाएंये दोहे सच में मन को हिम्मत देते हैं। आप बड़ी सरल भाषा में बहुत काम की बात कह जाते हैं। मुझे अच्छा लगा कि आप अभ्यास, धैर्य और भरोसे को बार-बार याद दिलाते हैं, क्योंकि असल ज़िंदगी में यही सबसे ज़्यादा काम आते हैं।
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