प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

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  बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है  टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप

शारदीय नवरात्र का ,आया पावन पर्व (दोहे)

 

Navratri dohe


1. शारदीय नवरात्र का, आया पावन पर्व ।

       नवदुर्गा नौरूप की, गाते महिमा सर्व ।।


2. नौ दिन के नवरात्र का , करते जो उपवास ।

       नवदुर्गा माता सदा , पूरण करती आस ।।


3. जगराते में हैं सजे, माता के दरबार ।

     गूँज रही दरबार में, माँ की जय जयकार ।।


4. माता के नवरूप का, पूजन करते लोग ।

     सप्तसती के पाठ से, बनें सुखद संयोग ।।


5. संकटहरणी माँ सदा, करती संकट दूर ।

     घर घर खुशहाली रहे, धन दौलत भरपूर ।।


6. शारदीय नवरात्र की, महिमा अपरम्पार ।

   विधिवत पूजन कर सदा, मिलती खुशी अपार ।।



हार्दिक अभिनंदन आपका🙏

पढ़िए एक और रचना कुण्डलिया छंद में

● व्रती रह पूजन करते


टिप्पणियाँ

  1. बहुत सुंदर दोहावली माता के स्नेहमयी आशीष से सजी हार्दिक बधाई !

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  2. माता के नवरूप का, पूजन करते लोग ।
    सप्तसती के पाठ से, बनें सुखद संयोग ।।
    बहुत सुन्दर प्रार्थना ।अति सुन्दर दोहावली ।
    नवरात्र पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ सुधा जी !

    जवाब देंहटाएं

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