प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज

चित्र
  बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज  । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद  आशा ला रही है  टिपटिप मधुर संगीत सी  भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ●  बसंत की पदचाप

जानी ऐसी कला उस कलाकार की....


 women praying

कुछ उलझने ऐसे उलझा गयी
असमंजस के भाव जगाकर
बुरी तरह मन भटका गयी,
जब सहा न गया, मन व्यथित हो उठा
आस भी आखिरी सांस लेने लगी
जिन्दगी जंग है हार ही हार है
नाउम्मीदी ही मन में गहराने लगी
पल दो पल भी युगों सा तब लगने लगा
कैसे ये पल गुजारें ! दिल तड़पने लगा
थक गये हारकर , याद प्रभु को किया
हार या जीत सब श्रेय उनको दिया
मन के अन्दर से "मै" ज्यों ही जाने लगा
एक दिया जैसे तम को हराने लगा
बन्द आँखों से बहती जो अश्रुधार थी
सूखती सी वो महसूस होने लगी
नम से चेहरे पे कुछ गुनगुना सा लगा
कुछ खुली आँख उजला सा दिखने लगा
उम्मीदों की वो पहली किरण खुशनुमा
नाउम्मीदी के बादल छटाने लगी
आस में साँस लौटी और विश्वास भी
जीने की आस तब मन में आने लगी
जब ये जानी कला उस कलाकार की
इक नयी सोच मन में समाने लगी
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी....

गहरा सा तिमिर जब दिखे जिन्दगी में
तब ये माने कि अब भोर भी पास है
दुख के साये बरसते है सुख बन यहाँ
जब ये जाने कि रौशन हुई आस है
रात कितनी भी घनी बीत ही जायेगी
नयी उजली सुबह सारे सुख लायेगी
जब ये उम्मीद मन में जगाने लगी
हुई आसान जीवन की हर इक डगर
जब से भय छोड़ गुण उसके गाने लगी
इक नयी सोच मन में समाने लगी
जानी ऐसी कला उस कलाकार की
भावना गीत बन गुनगुनाने लगी......


                         चित्र ;साभार गूगल से-

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