प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

सुंदर सकारात्मक सृजन
जवाब देंहटाएंआपकी लिखी रचना मंगलवार 16 मई 2022 को
जवाब देंहटाएंपांच लिंकों का आनंद पर... साझा की गई है
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आ.संगीता जी !
हटाएंमेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु ।
दिनांक ---- 17 मई
जवाब देंहटाएंजी, 🙏🙏🙏🙏
हटाएंबहुत ही सुंदर सराहनीय सृजन। नष्ट होते जंगल, पेड़ों का दोहन, मूक बैठा मानव... गहन चिंतन लिए बढ़िया रचना।
जवाब देंहटाएंसादर
बहुत सुन्दर सकारात्मक संदेश देती रचना !
जवाब देंहटाएंपर्यावरण संरक्षण के प्रति मनुष्यों की उदासीनता चिंतनीय है।आवश्यकता है आज प्रकृति के प्रति स्वंय के कर्तव्यों का बोध करने की अन्य लोगों को.भी प्रेरित करने की।
जवाब देंहटाएंसार्थक सृजन.सुधा जी।
सस्नेह।
इतनी विभिषिका झेलने के बाद भी हम असुरी नींद से नहीं जागे तो क्या कहा जाए। न जाने हम कब सुधरेंगे। प्रभावी सृजन।
जवाब देंहटाएंसुधा जी,
जवाब देंहटाएंहम जो प्रतिक्रिया लिखे क्यों नहीं दीख रहा प्लीज आप स्पेम में चेक करिये न क्योंकि मेरे ब्लॉग पर.भी बहुत सारी प्रतिक्रिया स्पेम में जा रही जिसे not spam करके हम पब्लिश किए।
शायद कुछ प्रतिक्रिया स्पेम में हों।
जी, श्वेता जी ! स्पेम में थी आपकी प्रतिक्रिया ..अन्य पोस्ट पर भी यही था । बहुत बहुत धन्यवाद बताने के लिए अब सभी को पब्लिश कर दिया...
हटाएंदिल से आभार आपका।
इन निरीह पेड़ों की व्यथा कौन जान सका है सिवाय कवि मन के।भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रिय सुधा जी।
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