प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

एक अनचाहे दर्द की अनुभूति हो आई आपकी इस रचना में सब को मुकम्मल जहां कहां मिलती है बहुत ही अच्छी रचना
जवाब देंहटाएंबडे जिनकी वजह से दूर हो जीना इन्हेंं पडता,
जवाब देंहटाएंनहीं सम्मान और आदर उन्हें इनसे कभी मिलता.।
बहुत सुंदर रचना।
वाह! बहुत गहन अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंवाह, सुंदर अहसास के साथ साथ मर्म को छूती सुंदर रचना।
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर !
जवाब देंहटाएंघर को स्वर्ग बनाने की परिपूर्ण विधि !
महज़ आकर्षण के लिए खुद को समेट रखा था
जवाब देंहटाएंहकीकत की ज़मीन पर जब ये पाँव रखा था
नहीं मिलता सबको जो मन ने चाहा होता है
स्वीकार करना चाहिए जो किस्मत में होता है ।।
आपने बखूबी प्रेम करने वालों के दर्द को बयाँ किया है जिनको अपनी पसंद का साथी न मिला हो ।
वाह!सुधा जी ,बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति ।
जवाब देंहटाएंसादर नमस्कार ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(18-7-21) को "प्रीत की होती सजा कुछ और है" (चर्चा अंक- 4129) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
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कामिनी सिन्हा
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी!मेरी रचना को मंच प्रदान करने हेतु।
हटाएंबहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
जवाब देंहटाएंवाह बहुत ही उम्दा आदरणीय
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर रचना
जवाब देंहटाएंबेहतरीन ग़ज़ल.प्रिय सुधा जी आपकी लेखनी हर विषय पर कमाल करती है।
जवाब देंहटाएंसस्नेह।