मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

बीती ताहि बिसार दे -अतीत छोड़कर वर्तमान में जीने की कला

परिचय :-

क्या आप भी बार-बार अपनी पुरानी बातों और दुखद यादों में खो जाते हैं?

क्या बीता हुआ कल आज की खुशियों पर भारी पड़ता है?

यदि हाँ, तो “बीती ताहि बिसार दे” केवल एक कहावत नहीं, बल्कि जीवन को सरल और सुखी बनाने का एक गहरा मंत्र है।

बीती ताहि बिसार दे अर्थ | अतीत को कैसे भूलें | motivational hindi article
अतीत को छोड़कर ही वर्तमान में सच्ची खुशी मिलती है ।

अतीत की यादें हमें क्यों सताती हैं :

अतीत का दामन थामें मन कभी-कभी अतीत के भीषण बियाबान में पहुँच जाता है और भटकने लगता है — उसी तकलीफ के साथ जिससे वर्षों पहले उबर भी चुका था।

दुखद यादें धीरे-धीरे मन और ध्यान में उतर जाती हैं। वे बीते घावों की पपड़ियाँ खुरचकर उस दर्द को फिर से ताज़ा कर देती हैं। हमें पता भी नहीं चलता कि यादों के झुरमुट में फँसकर हम अनजाने में उन्हीं कष्टों को दोबारा जी रहे होते हैं, जिनसे हम बड़ी बहादुरी से पार पा चुके थे।

नकारात्मक सोच का वर्तमान पर प्रभाव

कहा जाता है कि हम जिस पर ध्यान केंद्रित करते हैं, वही हमारे जीवन में बढ़ने लगता है। ऐसे में, जब हम बार-बार बीते दुखों का ध्यान करते हैं, तो हमारी नकारात्मक सोच हमारे वर्तमान के अच्छे दिनों को भी प्रभावित करने लगती है। यही कारण है कि “अतीत को कैसे भूलें” यह सवाल आज बहुत लोगों के मन में रहता है।

मन अतीत और भविष्य में क्यों उलझा रहता है

परंतु मन आज में टिकता ही कहाँ है! वह या तो भविष्य के सपनों में भटकता है या फिर अतीत की यादों में उलझा रहता है।

युवावस्था में यही मन आने वाले कल (भविष्य) के सुनहरे सपनों से भरा रहता है और हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, मन अतीत की यादों में जाकर पुराने अनुभवों और दुखों का हिसाब लगाने लगता है — और यहीं से मानसिक उलझनें शुरू होती हैं।

अतीत से सीख लें, बोझ नहीं

यदि हम चाहें, तो इन यादों के झुरमुट से कुछ खुशियाँ, अच्छे अनुभव और सीख लेकर उन्हें अपने वर्तमान में उतार सकते हैं। साथ ही, नकारात्मक अनुभवों को "लेट गो" करके तटस्थ भाव से वर्तमान पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

निष्कर्ष

“बीती ताहि बिसार दे” हमें सिखाता है कि अतीत को छोड़कर ही हम अपने आज को बेहतर बना सकते हैं।

कहीं ऐसा न हो कि बीती हुई नकारात्मक यादें हमारी जागरूकता को बोझिल करके हमारी आज की खुशियों को भी फीका कर दें। इसलिए जरूरी है कि हम वर्तमान में जीना सीखें और जीवन को सकारात्मक दिशा दें।

✨धन्यवाद🙏

पढ़िए एक और लेख निम्न लिंक पर:

तन में मन है या मन में तन

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टिप्पणियाँ

  1. यादों के झुरमुट से
    कुछ खुशियाँ,
    कुछ अच्छे अनुभव और
    ज्ञान लेकर
    झटपट वर्तमान की झोली में
    डाल नकारात्मक
    अनुभवों की यादों को
    लेट गो करके
    व्वाहहहह
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  2. जीवन यात्रा में खट्टी-मीठी स्मृतियों की पोटलियाँ ही एकमात्र पूँजी ही जो साँसों के साथ खनकती रहती है हमारे मन के गलियारों में आजीवन और समय की बारिश में स्मृतियों की सारी कड़ुवाहट फीकी पड़ जाती है बस इतनी सी बात है।
    बहुत सुंदर जीवन दर्शन लिखा है आपने।
    सस्नेह।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना मंगलवार ८ जुलाई २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. अच्छा लिखा है। मन का काम ही है बीते समय में भटकना।

    जवाब देंहटाएं
  4. सार्थक सारगर्भित अभिव्यक्ति सुधा जी , साथाही संदेश प्रद।
    हार्दिक बधाई सुंदर आलेख के लिए।

    जवाब देंहटाएं
  5. सार्थक चिंतन के साथ जीने के कला ही जीवन की नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करती हैं । आपके प्रेरक विचार हृदय के क़रीब लगे । बहुत सुन्दर पोस्ट ।

    जवाब देंहटाएं

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