मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

जीवन की राहों में आखिर असली प्रतिस्पर्धा किससे है ? | प्रेरणादायक लेख


जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धा किससे है?
बचपन से परीक्षाओं में अव्वल रहने वाले लोग अक्सर यह मान लेते हैं कि वे जीवन की हर प्रतिस्पर्धा में सफल होंगे। लेकिन क्या सच में ऐसा होता है?

जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धा और अकेलेपन को दर्शाती प्रेरणादायक तस्वीर



जीवन की राहों में असली प्रतिस्पर्धी कौन?

बचपन से परीक्षाओं में उत्तीर्ण और कक्षा में उत्तीर्ण रहने वाले लोगों को अपनी बुद्धिमानी पर कभी कोई संदेह नहीं रहता । उन्हें विश्वास हो जाता है कि जीवन की हर परीक्षा भी वे अपनी बुद्धि के बल पास कर ही लेंगे । 

लेकिन अक्सर वे नहीं जानते कि जीवन की  परीक्षाएं कुछ अलग होती हैं — यहाँ प्रतिस्पर्धी अपने ही होते हैं।


अपनों से प्रतिस्पर्धा का सच

 यह सच सामने आता भी है, तो वे सोचते हैं —
"अपनों से प्रतिस्पर्धा में भला क्या डर!"
हार भी अपनी और जीत भी अपनी ।

आगे बढ़ने की कीमत: अकेलापन

इसीअपनत्व और स्नेह के भाव के साथ वे आगे बढ़ते हैं।
लेकिन जैसे ही वे दूसरों से दो कदम आगे निकलते हैं, वे खुद को अकेला पाते हैं।

क्यों खींचते हैं लोग पीछे?

क्योंकि अपनों के साथ होने वाली ऐसी प्रतिस्पर्धाएं अक्सर आगे बढ़ने की होती ही नहीं, ये प्रतिस्पर्धाएं तो किसी को आगे बढ़ने से रोकने  की होती हैं । 

हाँ !  ये प्रतिस्पर्धाएं ऊपर उठने की नहीं,
बल्कि ऊपर उठने वाले को नीचे खींचने की होती है। 


जो लोग न तो पीछे धकेले जाते हैं और न ही नीचे गिराए जाते हैं,
वे जीवन की राहों में अकेले रह जाते हैं।

और फिर अक्सर भुला दिये जाते हैं , अपनों द्वारा ।  या फिर त्याग दिए जाते हैं, गये बीतों की तरह ।

उनके सभी अपने वहीं रहते हैं -- सब एक साथ , और जाने वाले का गढ़ देते है अपना मनचाहा प्रारूप, मनचाही छवि ।

ऐसे में आगे बढ़ने वालों को भी खुशी नहीं मिलती,
बल्कि एक गहरा मलाल रह जाता है।

असली प्रतिस्पर्धा खुद से है 

उन्हें लगता है कि उनका कोई अपना नहीं ,जो उनके सुख-दुख में साथ हो । वे अकेले हैं और अब उनका कोई प्रतिस्पर्धी भी नहीं।

मन की खिन्नता के चलते वे पीछे भी लौट नहीं पाते और आगे बढ़ना भी उनके लिए निरर्थक सा हो जाता है ।  
फिर वे भी ठहर से जाते हैं तब तक, जब तक उन्हें बोध नहीं होता--  
कि हमारी असली प्रतिस्पर्धा दूसरों से नहीं, बल्कि खुद से है ।

आपकी राय क्या है? क्या आपको भी कभी अपनों से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा है? कमेंट में जरूर बताएं।



✨धन्यवाद🙏

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टिप्पणियाँ

  1. जीवन का सब से बड़ा सत्य यही है सुधा जी !बहुत सुन्दर चिन्तन परक सृजन ।

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    1. जी, मीना जी ! अत्यंत आभार एवं धन्यवाद आपका ।

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  2. बहुत सुंदर सुधा संदेश 🙏🏼🙏🏼🙏🏼

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  3. सच है इंसान को अपनी सोच से लड़ना होता है ... आगे आना होता है ...

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