मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

गुस्सा क्यों हो सूरज दादा


Summer sun


गुस्सा क्यों हो सूरज दादा !

आग उगलते हद से ज्यादा !


लू की लपटें फेंक रहे हो ,

आतप अवनी देख रहे हो ।


छाँव भी डरकर कोने बैठी,

रश्मि तपिश दे तनकर ऐंठी ।


बदरा जाने कहाँ खो गये,

पर्णहीन सब वृक्ष हो गये ।


माँ धरती भी दुःखी रो रही,

दया आपकी कहाँ खो गयी ?


जल, जलकर बस रेत बची है ।

अग्निकुंड सी वो भी तची है !


दीन-दुखी को और दुखाते !

नीर नदी का भी क्यों सुखाते ?


मेरी मानो सूरज दादा !

मत त्यागो निज नेक इरादा ।


सूर्य देव हो तुम जगती के !

अर्ध्य देते जल सब भक्ति से ।


जीव-जगत के हो रखवारे

वन्य वनस्पति तुमसे सारे ।


क्यों गुस्से में लाल हो रहे

दीन-हीन के काल हो रहे ।


इतना भी क्यों गरमाए हो ?

दिनचर्या से उकताये हो ?


कुछ दिन छुट्टी पर हो आओ !

शीत समन्दर तनिक नहाओ !


करुणाकर ! करुणा अब कर दो !

तप्त अवनि का आतप हर दो !



पढ़िए सूरज दादा पर मेरी एक और रचना

● कहाँ गये तुम सूरज दादा !


टिप्पणियाँ

  1. क्या करेंगे सूरज दादा,मानवों की स्वार्थपरता से व्यथित हैं,
    दंड तो देने का है इरादा,प्रकृति का हाल देख शायद द्रवित हैं।
    प्रकृति के उग्र रूप का बहुत सुंदर, सरल,निश्छल अभिव्यक्ति दी
    सस्नेह प्रणाम
    सादर
    ---
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार २५ मई २०२४ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं

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