प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

उसे पालना ही अब कर्तव्य उसका
जवाब देंहटाएंन मानेगी किस्मत से हार.....
होगा इसे भी जीवन में कहीं
सुख का कोई इंतजार.......।
बहुत सुन्दर ,सटीक एवं सारगर्भित भावपूर्ण रचना...
हृदयतल से धन्यवाद संजय जी!
हटाएंजी नमस्ते,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(२३-०५-२०२०) को शब्द-सृजन- २२ "मज़दूर/ मजूर /श्रमिक/श्रमजीवी" (चर्चा अंक-३७११) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
सहृदय धन्यवाद अनीता जी मेरी रचना को स्थान देने हेतू....
हटाएंसस्नेह आभार आपका।
होगा इसे भी जीवन में कहीं
जवाब देंहटाएंसुख का कोई इन्तजार...?
सच ऐसे हाल में भी वो खुश रह लेते हैं ,मार्मिक सृजन सुधा जी ,सादर नमन
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार कामिनी जी !
हटाएंहोगा इसे भी जीवन में कहीं
जवाब देंहटाएंसुख का कोई इंतजार...?
हृदयस्पर्शी चिन्तन सुधा जी ..सुख का इन्तज़ार होता है उन्हें भी
मगर उनके हिस्से में परेशानियां ही अधिक होती हैं ।
हार्दिक धन्यवाद एवं आभार मीना जी !
हटाएंमार्मिक यथार्थ दिखाती बहुत दर्द भरी रचना सुधा जी।
जवाब देंहटाएंसारगर्भित सृजन।
हृदयतल से धन्यवाद एवं आभार कुसुम जी !
हटाएंमार्मिक रचना
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