प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज
बाग की क्यारी के पीले हाथ होते आज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज फूल,पाती, पाँखुरी, धुलकर निखर गयी श्वास में सरगम सजी, खुशबू बिखर गयी भ्रमर दल देखो हुए हैं प्रेम के मोहताज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । आम बौराने लगे, कोयल मधुर गाती ठूँठ से लिपटी लता, हिलडुल रही पाती लगती बड़ी बहकी हवा, बदले से हैं अंदाज प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । सौंधी महक माटी की मन को भा रही है अंबर से झरती बूँद आशा ला रही है टिपटिप मधुर संगीत सी भीगे से ज्यों अल्फ़ाज़ प्रीत की बरखा लिए, लो आ गए ऋतुराज । पढ़िये एक और रचना निम्न लिंक पर ● बसंत की पदचाप

आपकी लिखी रचना सोमवार. 17 जनवरी 2022 को
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आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
हृदयतल से धन्यवाद आ.संगीता जी! मेरी रचना के चयन हेतु।
हटाएंसादर आभार।
हुतात्माओं के परिवार की दशा पर सटीक और हृदय स्पर्शी सृजन किया है आपने सुधा जी।
जवाब देंहटाएंआंखे नम कर गया आपका दर्द में डूबा सार्थक सृजन।
जिस दर्द को आपने शब्द-भाव दिया है, कल्पना कर के रोम-रोम सिहर जाता है । आह!
जवाब देंहटाएंवीरों के वीर गाथाओं में
जवाब देंहटाएंगुम उनके अपनों का दर्द
आँसू,सिसकी,तड़प से परे
मातृभूमि के लिए उनके फर्ज़
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सुधा जी,
कुछ अनकहे दर्द को आपने शब्द दिया जिसे वीरों के शहादत
की ओजमयी गाथाओं के महिमामंडन में अनदेखा कर दिया जाता है।
...
सस्नेह।
बहुत सुंदर मन को छूती हुई अभिव्यक्ति
जवाब देंहटाएंप्रिय सुधा जी, शहीद की चिता में उसके साथ समस्त परिवार के सपने भी जलकर राख हो जाते हैं। उनके परिवारों की व्यथा शब्दों में कही या लिखी नहीं जा सकती। आपने इस व्यथा शब्दांकित कर आपने बहुत मार्मिक सृजन किया गया। सच में एक अपार संभावनाएं लिए युवा जब अकाल मृत्युपथ की ओर अग्रसर होते हैं तो वह समय उनके अबोध परिवार के लिए बहुत दुभर होता होगा। मार्मिक रचना के लिए हार्दिक आभार।
जवाब देंहटाएंतहेदिल से धन्यवाद प्रिय श्वेता आज के विशेषांक में मेरी रचना साझा करने हेतु ।
जवाब देंहटाएंसस्नेह आभार ।
वाह
जवाब देंहटाएंअमर बलिदानियों के अपनों की पीड़ा को अभिव्यक्त करती ये मार्मिक रचना वेदना का दस्तावेज है। आज फिर से पढकर मन भावुक हो गया।हमारे बलिदानियों को विनम्र श्रद्धांजलि और कोटि -कोटि नमन 🙏
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