मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा | गढ़वाली गीत

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  ✨ परिचय (Intro) गढ़वाल की वादियों में हर मौसम अपनी अलग कहानी लेकर आता है, लेकिन मोल्यारी मास (बसंत ऋतु) का सौंदर्य कुछ खास होता है। यह गीत उसी बसंती एहसास, पहाड़ की खुशबू, बचपन की यादों और लोकजीवन की सरलता को शब्दों में पिरोता है। कलीं कलीं वनफसा फूलीं, उँण्या कुण्याँ सँतराज खिल्याँ  मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  बाट किनार बसींगा फूलीं छन रौली-खौली काली जीरी फूलीं  चल दगड़्यों म्याल खैयोला बण की डाली फलूण झूलीं उड़दि तितली रंग-बिरंगी भोंरा बि छन गुंजण लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा,डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ  ऊँची डाड्यूँ मा सुनेरी उल्यार रोली खोली हर्याली छयीं छुम बजांदि दाथुणि छुमका घास घस्याण घसेरी जयीं खुदेड़ गीतुंक गुणगुणाट आँख्यूँ मा टुपि दे आँसू बह्याँ। मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ पुराण दिन याद आदिन मैति मैत्युंक लोभ लग्याँ खुद लगदि ज्यु खुदेंदी फूलूँ दगड़ी भाव बग्याँ धरती म्यरि, म्यरु पहाड़्यों स्वरग जणि च भलि लग्याँ मोल्यारी मास म्यर पहाड़ मा, डाँडी-काँठी फुल्यारी सज्याँ फसल कटि, बिखौंति मनीगे जगा जगा ...

'उलझन' किशोरावस्था की



confusions of teenagers
                                                                     


सुनो माँ ! अब तो बात मेरी
और आर करो या पार !
छोटा हूँ तो बचपन सा लाड दो
हूँ बड़ा तो दो अधिकार !

टीवी मोबाइल हो या कम्प्यूटर
मेरे लिए सब लॉक ?
थोड़ी सी गलती कर दूँ तो
सब करते हो ब्लॉक ?

कभी  कहते हो बच्चे नहीं तुम
छोड़ भी दो जिद्द करना !
समझ बूझ कुछ सीखो बड़ों से
बस करो यूं बहस करना !

कभी मुकरते इन बातों से
बड़ा न मुझे समझते
"बच्चे हो बच्चे सा रहो" कह
सख्त हिदायत देते

उलझन में हूँ  समझ न आता !
ऐसे मुझको कुछ नहीं भाता !
बड़ा हो गया या हूँ बच्चा !
क्या मैं निपट अकल का कच्चा ?

पर माँ ! तुम तो सब हो जानती
नटखट लल्ला मुझे मानती ।
फिर अब ऐसे मत रूठो ना
मेरी गलती छुपा भी लो माँ!

माँ मैं आपका  प्यारा बच्चा
जिद्दी हूँ पर मन का सच्चा !


           चित्र साभार गूगल से..  














टिप्पणियाँ

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज रविवार 26 एप्रिल 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    उत्तर
    1. सहृदय धन्यवाद यशोदा जी! मेरी रचना को सांध्य दैनिक मुखरित मौन में साझा करने हेतु...
      सादर आभार।

      हटाएं
  2. सुधा दी,किशोरावस्था की उलझन को आपने बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त किया हैं। हर इंसान की किशोरावस्था में यहीं हालत होती हैं।

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    उत्तर
    1. जी ज्योति जी!तहेदिल से धन्यवाद आपका मेरे विचारों से सहमत होने हेतु...
      सस्नेह आभार।

      हटाएं
  3. उलझन में हूँ समझ न आता
    ऐसे मुझको कुछ नहीं भाता
    बड़ा हो गया या हूँ बच्चा !
    क्या मैं निपट अकल का कच्चा ? बहुत सुंदर रचना किशोरावस्था की उलझन को व्यक्त करती।

    जवाब देंहटाएं
  4. सुनो माँ अब तो बात मेरी
    और आर करो या पार!
    छोटा हूँ तो बचपन सा लाड दो
    हूँ बडा़ तो दो अधिकार !

    टीवी मोबाइल हो या कम्प्यूटर
    मेरे लिए सब लॉक
    थोड़ी सी गलती कर दूँ तो
    सब करते हो ब्लॉक... बेहतरीन सृजन आदरणीया दीदी 👌

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. बहुत बहुत धन्यवाद अनीता जी! उत्साह वर्धन हेतु...
      सस्नेह आभार।

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  5. ये किशोरावस्था होती ही ऐसी है ...।बहुत ही उम्दा सृजन सुधा जी ।

    जवाब देंहटाएं
  6. सहृदय धन्यवाद अनीता जी रचना साझा करने हेतु।

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  7. अभूतपूर्व जी, हमारे ब्लॉग पर भी जरूर देखें प्रेरणादायक सुविचार

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